Description
पुष्प संख्या – 119
भाषा – *हिन्दी*
कुल पृष्ठ – 76
पुस्तक आकार – 120×180mm
कवर – पेपरबैक
लेखक – *स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी*
संस्करण – तृतीय (सन् 2024)
प्रकाशक – *स्वस्ति प्रकाशन संस्थान*
इसमें नीतिसम्बन्धी कुल एक सौ आठ श्लोक सनातन नीतिशास्त्रोंसे सङ्कलितकर पूज्यपादने उनका मनोरम अर्थ किया है तथा अपेक्षित स्थलपर मार्मिक विवरण भी सन्निहित किया है। इसमें ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव’ (तैत्तिरीयोपनिषत् १) के अनुरूप माता, पिता, आचार्य और अतिथिके प्रति ; तद्वत् राष्ट्रके प्रति आस्थान्वित करनेवाले वचनोंको सन्निहित किया गया है।
इसमें सनातनसंस्कृतिके अनुरूप शिक्षा, रक्षा, न्याय, सेवा, संस्कार और जीविकासे समन्वित यज्ञमय, योगमय और सुखमय जीवनकी संरचनापर प्रकाश डाला गया है। इसमें नास्तिकतारहित तथा महगाई – विनिर्मुत्त विशुद्ध पर्यावरणसहित और गोवंश – गङ्गादि सर्वहितप्रद प्रशस्त सनातन मानबिन्दुसम्पन्न, विकासको विकास सिद्ध किया गया है।
इसमें विकासके नामपर गोवंशादि मानबिन्दुओंको विकृत, दूषित, कुपित और विलुप्त करनेके दुर्व्यसनको घातक सिद्ध किया गया है। इसमें धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको परिभाषितकर मानवजीवनकी सार्थकताका मार्ग प्रशस्त किया गया है।
मानवोचित शील , संयम और दिव्यताओंसे सम्पन्न व्यत्ति, परिवार , समाज, राष्ट्र एवम् विश्वसंरचनाकी भावनासे इसका दैनिक अध्ययन नितान्त अपेक्षित है। इस संरचनाको समुज्ज्वल जीवनकी सञ्जीवनी समझकर जीवनपर्यन्त इसके सेवनका व्रत सर्वसुमङ्गल है।









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