Description
पुष्प संख्या – 96
भाषा – *हिन्दी*
पृष्ठ संख्या – 144
पुस्तक आकार – 135×215mm
कवर – पेपरबैक
व्याख्याकार – *स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी*
संस्करण – द्वितीय (सन् 2026)
प्रकाशक – *स्वस्ति प्रकाशन संस्थान*
श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी निश्चलानन्दसरस्वतीमहाभागने पूर्वाचार्योंके द्वारा विरचित चतुराम्नाय तथा चतुष्पीठसे सम्बद्ध सामग्रीका सङ्कलनकर उसकी अद्भुत व्याख्या की है। इसमें सन्निहित *’ मठाम्नाय सेतु महानुशासनम् ‘* श्रीभगवत्पाद आदि शङ्कराचार्यके द्वारा विरचित ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त इसमें *’ मठाम्नायोपनिषत्’*, *’ राजा सुधन्वाकी ताम्रपत्रविज्ञप्ति,* *’चतुष्पीठकी आचार्यपरम्परा’*, *’ श्रीभगवत्पाद आदि शङ्कराचार्यका कालनिर्धारण’* एवम् *’पीठासीन आचार्योंकी कालगणना*’, *’ विवरण ‘* तथा *’सन्तुलित समीक्षा’* आदि महत्त्वपूर्ण तथ्योंका सन्निवेश है।
चिर प्रतीक्षित तथा अपेक्षित इस ग्रन्थका सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक और ऐतिहासिक क्षेत्रमें समादर सुनिश्चित है।
चतुराम्नाय चतुष्पीठ तथा इनसे सम्बद्ध विविध संस्थानोंको विकृत और विलुप्त होनेसे बचानेके लिए इस ग्रन्थका चतुर्दिक् अनुशीलन और अनुपालन अपेक्षित है।
सनातनसंस्कृतिके विलोपक संविधान तथा शासनतन्त्रको निरस्तकर सनातनसंस्कृतिके अनुरूप संविधान तथा शासनतन्त्रको क्रियान्वित करनेके लिए इस ग्रन्थका अनुशीलन आवश्यक है।
मठ – मन्दिर सांस्कृतिक दुर्ग हैं। इन्हें शिक्षा, रक्षा, संस्कृति, सेवा एवम् धर्म तथा मोक्षके संस्थान बनाये रखने पर ही प्राणियोंके सर्वविध कल्याणका मार्ग प्रशस्त हो सकता है; अन्यथा नहीं।
धर्म और मोक्षके संस्थान मठ मन्दिर; तद्वत् गोवंश, गङ्गा आदिका केवल अर्थ तथा काम या धन और मानके लिए उपयोग और विनियोग इनकी विकृति तथा इनके विलोपका मुख्य कारण है।
गोवंश, गङ्गा, मठ-मन्दिर, सती, सत्यवादी, दानशील आदि सनातन प्रशस्त मानविन्दुओंकी रक्षाकी भावनासे व्यासपीठ तथा शासनतन्त्रको सुव्यवस्थित करना आवश्यक है। तदर्थ स्वस्थ व्यूहरचनाकी भावनासे इस ग्रन्थका अनुशीलन आवश्यक है।





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