Description
पुष्प संख्या – 80
भाषा – *हिन्दी*
पृष्ठ संख्या – 152
पुस्तक आकार – 135×215mm
कवर – पेपरबैक
रचयिता – *स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी*
संस्करण – द्वितीय (सन् 2026)
प्रकाशक – *स्वस्ति प्रकाशन संस्थान*
पूज्यपाद श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य पुरीपीठाधीश्वरजी की दृष्टिमें सत्यसहिष्णुताकी क्रमिक अभिव्यक्ति में बौद्धादि दर्शनोंका उपयोग और विनियोग है। *”तत्त्वपक्षपातो हि स्वभावो धियाम्”* के अनुसार सत् – तत्त्वका पक्षधर होना बुद्धिका स्वभाव है। अतः दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातलपर सत्यका शास्त्रानुरूप युक्तियुक्त प्रतिपादन अपेक्षित तथा महत्त्वपूर्ण है।
पूज्यपादके शब्दोंमें सिद्धान्तके नामपर अनावश्यक सङ्घर्ष और सामञ्जस्यके नामपर सिद्धान्तका परित्याग सर्वथा अनुचित है। परस्पर सद्भावपूर्ण सम्वादके द्वारा अनावश्यक दूरीका परित्याग आवश्यक है। जैन, बौद्ध और सिक्ख सनातनियोंके अभिन्न अङ्ग हैं। तीनोंके पूर्वज और मूल गुरु तथा प्रमुख आचार्य सनातन कुलमें समुत्पन्न हुए हैं। ऋषभश्री, श्रीमहावीर, श्रीबुद्ध, धर्मकीर्ति, नागार्जुन एवम् श्रीनानकसे गुरु गोविन्दसिंह पर्यन्त सनातनियोंकी भी आस्थाके केन्द्र रहे हैं।
इस सन्दर्भमें ग्रन्थकारका यह दृष्टिकोण ध्यान रखने योग्य है कि *किसी भी प्रशस्त दर्शनके मुख्य सिद्धान्तको उत्तर दर्शन लाञ्छित नहीं करता, अपितु अवान्तर प्रवाहको परिमार्जितकर मुख्यसिद्धान्तको विकसितमात्र करता है।* यथा चार्वाक दर्शनके मुख्य सिद्धान्त देह – बाह्य वस्तुओंके अनात्मत्वका समर्थन कर वेदान्तदर्शन चेतनाविशिष्ट देहके आत्मत्वपक्षका परिमार्जन करते हुए देह विशिष्ट चेतनाकी सहिष्णुता समुत्पन्न करनेके अनन्तर केवल चिद्धातुके आत्मत्व और अद्वितीयत्वकी क्रमिक सत्यसहिष्णुता समुत्पन्न करता है।
प्रस्तुत ग्रन्थ *”बौद्धसिद्धान्त और वेदान्त”* के अनुशीलनसे बौद्धप्रस्थान और वेदागमसिद्धान्तका सामञ्जस्यपूर्ण तुलनात्मक परिज्ञान सुनिश्चित है।











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