Description

पुष्प संख्या – 83
भाषा – *हिन्दी*
कुल पृष्ठ – 44
पुस्तक आकार – 109×140mm
कवर – पेपरबैक
रचयिता – *स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी*
संस्करण – द्वितीय (सन् 2026)
प्रकाशक – *स्वस्ति प्रकाशन संस्थान* पुष्प संख्या – 83
भाषा – *हिन्दी*
कुल पृष्ठ – 44
पुस्तक आकार – 109×140mm
कवर – पेपरबैक
रचयिता – *स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी*
संस्करण – द्वितीय (सन् 2026)
प्रकाशक – *स्वस्ति प्रकाशन संस्थान*

पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्वर- श्रीमज्जगद्गुरु-शङ्कराचार्यके पदपर अट्ठारह वर्ष पूर्व विधिवत् प्रतिष्ठित होनेके पश्चात् पूज्यपाद भारत तथा नेपालकी व्यापक यात्रा कर रहे हैं। स्वयंको हिन्दू माननेवाले बुद्धिजीवियोंने यात्राके सन्दर्भमें ऐसी भावना व्यक्त की कि जिन पथोंमें मात्र एक-दो ग्रन्थ, एक-दो तीर्थ, एक-दो सन्त, संक्षिप्त तथा सीमित उपासनापद्धति तथा एक ही उपास्य देव हैं, उन पथोंको समझना सुगम है एवं उनके अनुयायियोंकी सङ्ख्या भी अधिक है। इतना ही नहीं, उनके अनुयायियोंमें कट्टरता तथा एकता भी अधिक है। जब कि हिन्दूधर्ममें विधर्मियोंके व्यापक विध्वंसके बाद भी हजारों ग्रन्थ तथा तीर्थ अवशिष्ट हैं । कृतयुगसे लेकर अबतकके कलिकाल पर्यन्त विविध विलक्षण अनेकों सन्तोंके द्वारा विविध विलक्षण उपासनापद्धति तथा उपास्य निर्धारित किये गये हैं । ऐसी स्थितिमें हिन्दूधर्मको समझ पाना, इसके विविध ग्रन्थों, तीर्थों तथा मानबिन्दुओं की रक्षा कर पाना एवम् स्वानुकूल उपासनापद्धति और उपास्यका चयन कर पाना असम्भव – सा है।

उक्त भावना व्यक्त करनेवाले महानुभावोंने आचार्यचरणसे यह अनुरोध किया कि हिन्दुधर्ममें विविधतामें एकताका साधक एक ऐसा ग्रन्थ अवश्य होना चाहिए, जिसमें हिन्दुधर्मके प्रवर्तकका नाम, धर्मप्रवर्तनका काल, मान्य ग्रन्थ, ग्रन्थ सारार्थ, मन्त्र, तीर्थ, गोत्र, ऋषि, मान्य आचार्य, उपासना, उपास्य सर्वेश्वरका स्वरूप, चिह्न तथा ध्वज आदि गिने-चुने विषयोंका गिने-चुने शब्दोंमें सरल तथा सरस हिन्दीमें वर्णन हो एवम् उसका अनुवाद आ‌ङ्ग्लादि भाषामें भी हो । विविधतामें एकताका ख्यापक यह निबन्ध वर्तमानमें हिन्दुओंक अस्तित्व तथा आदर्शकी रक्षाकी दृष्टिसे विशेष महत्त्वपूर्ण हैं ।
SSH

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